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अ॒भि प्र॑वन्त॒ सम॑नेव॒ योषाः॑ कल्या॒ण्यः१॒॑ स्मय॑मानासो अ॒ग्निम्। घृ॒तस्य॒ धाराः॑ स॒मिधो॑ नसन्त॒ ता जु॑षा॒णो ह॑र्यति जा॒तवे॑दाः ॥८॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi pravanta samaneva yoṣāḥ kalyāṇyaḥ smayamānāso agnim | ghṛtasya dhārāḥ samidho nasanta tā juṣāṇo haryati jātavedāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि। प्र॒व॒न्त॒। सम॑नाऽइव। योषाः॑। क॒ल्या॒ण्यः॑। स्मय॑मानासः। अ॒ग्निम्। घृ॒तस्य॑। धाराः॑। स॒म्ऽइधः॑। न॒स॒न्त॒। ताः। जु॒षा॒णः। ह॒र्य॒ति॒। जा॒तऽवे॑दाः ॥८॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:58» मन्त्र:8 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:11» मन्त्र:3 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे (घृतस्य) घृत की (धाराः) धारा और (समिधः) काष्ठ (अग्निम्) अग्नि को (नसन्त) प्राप्त होते हैं, वैसे (कल्याण्यः) कल्याण करनेवाली (स्मयमानासः) कुछ हँसती हुई प्रमाणयुक्त हँसनेवाली (योषाः) स्त्रियाँ (समनेव) तुल्य मनवाली पतिव्रता स्त्री के सदृश अभीष्ट पतियों को (अभि, प्रवन्त) सम्मुख प्राप्त हों और जैसे (ताः) वे सुख को प्राप्त होती हैं, वैसे विद्या और धर्म का (जुषाणः) सेवन करता हुआ (जातवेदाः) विज्ञान से युक्त विद्वान् सब के प्रिय की (हर्यति) कामना करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोमालङ्कार हैं। जैसे अग्नि और इन्धन के संयोग से प्रकाश होता है, वैसे उत्तम अध्यापक और पढ़नेवाले के सम्बन्ध से विद्या का प्रकाश होता है। और जैसे स्वयंवर जिन्होंने किया ऐसे स्त्री-पुरुष परस्पर के सुख की कामना करते हैं, वैसे ही उत्पन्न हुई विद्या जिनको ऐसे योगी जन सब का सुख उत्पन्न कराते हैं ॥८॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्वद्विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यथा घृतस्य धाराः समिधश्चाग्निं नसन्त तथा कल्याण्यः स्मयमानासो योषाः समनेवाभीष्टान् पत्नीनभि प्रवन्त यथा ताः सुखं लभन्ते तथा विद्याधर्म्मौ जुषाणो जातवेदाः सर्वं प्रियं हर्यति ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अभि) (प्रवन्त) गच्छन्तु (समनेव) समानमनस्का पतिव्रतेव (योषाः) स्त्रियः (कल्याण्यः) कल्याणकारिण्यः (स्मयमानासः) किञ्चिद्धसन्त्यो मितहासाः (अग्निम्) पावकम् (घृतस्य) आज्यस्य (धाराः) (समिधः) काष्ठानि (नसन्त) प्राप्नुवन्ति (ता) (जुषाणः) प्रीतः सन् (हर्यति) कामयते (जातवेदाः) जातविज्ञानः ॥८॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यथाग्नीन्धनसंयोगेन प्रकाशो जायते तथोत्तमाऽध्यापकाऽध्येतृसम्बन्धेन विद्याप्रकाशो भवति। यथा स्वयंवरौ स्त्रीपुरुषौ परस्परस्य सुखं कामयेते तथैवोत्पन्नविद्यायोगिनः सर्वस्य सुखं भावयन्ति ॥८॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा अग्नी व इंधनाच्या संयोगाने प्रकाश उत्पन्न होतो तसे उत्तम अध्यापक व शिष्य यांच्या संबंधाने विद्येचा प्रकाश होतो व जसे स्वयंवर केलेले स्त्री - पुरुष सुखाची कामना करतात तसे विद्यायुक्त योगी सर्वांचे सुख निर्माण करवितात. ॥ ८ ॥